कृष्ण काव्य की प्रमुख प्रवृत्तियाँ बताइए

 


1. राधा कृष्ण की लीलाओं का वर्णन


कृष्ण भक्त कवियों ने अपने काव्य में राधा कृष्ण की लीलाओं का वर्णन विशेष रूप से किया है। श्री कृष्ण के बाल रूप व प्रेम लीला के मधुर चित्रण कृष्ण भक्त कवियों ने अपनी रचनाजों में बखूबी किया है।


2. सख्य भाव की भक्ति


इस धारा की भी एक विशेष प्रवृत्ति है कि इसकी भक्ति में सख्य एवं कान्ताभाव की प्रधानता है। सख्य भाव की प्रधानता के कारण ही इस धारा के भक्त कवियों ने श्रीकृष्ण को अपना मित्र माना है तथा इसी भाव से उनकी उपासना की है। एक मित्र की तरह कृष्ण भक्त कवियों ने उन्हें विविध प्रकार के उपालम्भ दिये हैं। इसके साथ ही इस काव्यधारा के काव्य में दास्य भाव की भक्ति के दर्शन भी होते हैं।


3. वाल्सल्य रस का चित्रण


कृष्ण काव्य में वात्सल्य रस का अनुपम चित्रण हुआ है। बालकृष्ण की चेष्टाओं का सूक्ष्म और सजीव चित्रण जैसा इन कवियों ने किया है, वैसा अन्यत्र नहीं मिलता


4. प्रकृति चित्रण


कृष्ण काव्य में भाव की प्रधानता होने के कारण प्रकृति चित्रण अधिक हुआ है। जहाँ जहाँ राधा कृष्ण के सौंदर्य का चित्रण किया गया है वहाँ उनकी ब्रजभूमि का सौंदर्य निरूपण भी कृष्णभक्त कवियों ने अच्छी तरह से किया है।


5. रीति तत्वों का समावेश


कृष्ण भक्ति साहित्य आनंद और उल्लास का साहित्य है। कृष्ण भक्त कवियों ने अपने काव्य में श्रृंगार वर्णन के साथ साथ रीति तत्व का भी समावेश किया है। काव्य में अलंकार निरूपण एवं नायिका भेद का सुंदर चित्रण भी प्रस्तुत किया गया है। सूरदास और नंददास जैसे महान कवियों ने अपने काव्य में रीति तत्व का समावेश बखूबी किया है। सूरदास ने 'साहित्य लहरी' में नायिका भेद एवं अलंकार का वर्णन किया है तथा नंददास ने भी 'रसमंजरी' में नायिका भेद का वर्णन किया है।।


6. संगीतात्मकता


कृष्ण काव्य संगीतात्मक है। संगीत की राग- रागिनियों का प्रयोग प्रायः सभी कवियों ने किया है। आज भी संगीत के क्षेत्र में इन पदों का महत्व है। सूर, मीरा, हितहरिवंश, हरिदास आदि कवियों के पदों में संगीत की छटा है।

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